अमृतसर गए क़रीब साल भर होने को आया। लोहड़ी पर गया था...एक दोस्त के घर। जनवरी का अमृतसर बेहद ख़ुशगवार लगा। पतंगों, मूंगफलियों और रेवड़ियों वाला शहर...और हां, परांठों पर तैरते घर के मक्खन वाला शहर भी। इस शहर में ऊर्जा बहुत है। दरअस्ल पंजाबी कल्चर है ही कुछ धमाकेदार। इसलिए ही शायद जहां पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों में संगीत लहरियां सितार जैसे वाद्य पर सजती हैं तो पंजाब में तो ढोल-नगाड़ों के बिना काम ही नहीं चलने वाला। आप ख़ुद-ब-ख़ुद थिरकने लगेंगे।
स्वर्ण मंदिर जाना हुआ, वाघा बॉर्डर भी, जलियांवाला भी देखा, सड़कों पर मांझा बनते यहीं देखा, दोस्त की फ़ैन्स के कॉलेज भी ताके। किसी ने बताया कि लोहड़ी पर सरहद के दोनों तरफ़ जमकर पतंगबाज़ी होती है और कई बार पाकिस्तान से पतंगें अपने मुल्क में आकर गिरती हैं तो यहां की पतंगें वहां...जावेद साहब का
कई साल पहले लिखा गाना याद आ गया- 'पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके'।
ये कोशिश है, अमृतसर की ख़ुशबू को, तस्वीरों के ज़रिए आप तक पहुंचाने की।
(वैसे आप जो ऊपर ब्लॉग के शीर्षक वाला बैनर देख रहे हैं, उसकी दोनों मछलियां स्वर्ण मंदिर के ताल में ही तैरती पाई गईं थीं !)



